Poetry

गूंज ख़ामोशी की

खोखले उसूलों से भरे ये दिमाग़
खाली कमरे में आवाज़ों सी गूंजती
कोई इन्हे ज़ीस्त-ओ-ज़िन्दगी से भर दे
कि इस शोर को मिटाते थक गई है ख़ामोशी ईमान की

धडकनों की जुगलबंदी जब रफ्तार लेते हुए
पीछे छोड़ने लगी हो ज़हन-ओ-जिस्म गफलत में
कोई इस दिल को दस्तूर-ए-इश्क़ से वाक़िफ करादे
कि इस दौड़ में खो गई है ख़ामोशी इज़हार की

दौलत-ओ-शोहरत-ओ-अना के नशे में चूर
ये दुनिया भूलने लगी है ज़मीर और रिश्तों को
कोई इन्हे मयख़ाने का ही रास्ता दिखा दे
कि शायद शराब में सुन ले ये ख़ामोशी इंसानियत की

क्या अच्छा है क्या बुरा ना समझ सका ये शायर
इंद्राज-ए-जन्नत-ओ-जहन्नुम एक से दिखने लगें हैं
कोई मुझे दिला दे सुकूत, वो किताब-ए-मुकद्दस
या इस शेर-ओ-शायरी को ही फ़ना कर दे ख़ामोशी ख़ुदा की

There are certain thoughts and ideas that can only be written in a particular language and translating them into another language would be sheer injustice to the beauty of the original text. I must however confess that I am not comfortable writing in Urdu, but here goes my first attempt, hope you like it.

Standard